“होनी होय सो होय | कबीरदास प्रवचन: जीवन बदलने वाली सीख”
होनी होय सो होय – पहला भाग (कबीर प्रवचन) प्रवचन: “होनी होय सो होय” – पहला भाग प्रस्तावना भाइयों और बहनों, कबीरदास जी हमारे संत-परंपरा के ऐसे दीपक हैं जिनकी रोशनी आज भी उतनी ही ताज़ा है जितनी 500 साल पहले थी। वे 15वीं शताब्दी में हुए। उस समय समाज ऊँच-नीच, जाति-पांति, मंदिर-मस्जिद, कर्मकांड और अंधविश्वास में उलझा हुआ था। लोग धर्म को ढकोसले में समझ रहे थे। कबीरदास ने ऐसे समय में सीधी बात कही – “सत्य को खोजो, दिखावे को छोड़ो। ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है।” “मंगन से क्या मांगिए, बिन मांगे जो देय। कहैं कबीर मैं हौं वाही को, होनी होय सो होय।।” इन पंक्तियों में जीवन का सबसे बड़ा रहस्य छिपा है: मांगना हमें भिखारी बनाता है। बिना मांगे मिलने वाला ही असली प्रसाद है। और अंत में, भक्त का भरोसा यही है कि — “होनी होय सो होय।” 1. इंसान का स्वभाव – हमेशा मांगना जरा सोचिए, क्या ऐसा कोई दिन है जब हम कुछ न मांगें? बच्चा पैदा होते ही माँ से दूध मांगता है। स्कूल जाने वाला बच्चा खिलौने ...
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