ओशो ने कभी अपने शिष्योको कुछ दिया नहीं ?

हाय और धन्यवाद आपके प्रश्न के लिए। मुझे पूरी तरह से समझ आता है कि जब आप ओशो के प्रवचन सुनते हैं, तो आप उनके आदर्शों के सामने खुद को नकारात्मक देखते हैं। यह बहुत सामान्य है और बहुत से लोगों के साथ होता है। ओशो के उपदेशों का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि वे सब कुछ खुद की अनुभूति पर आधारित हैं। यदि आप ओशो के उपदेशों को सुनते हुए अपनी अनुभूति को अपनाने की कोशिश करें, तो उनसे अधिक उपयोगी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आपके स्वयं के नकारात्मक विचारों के लिए, ओशो ने एक उपदेश दिया है: "एक चीज जो तुम कभी नहीं करनी चाहिए वह है खुद से लड़ना।" ओशो आपको किसी भी आदर्श के पीछे नहीं भागने के लिए कहते हैं, बल्कि उन्होंने आपको अपनी अनुभूति से निर्धारित आदर्शों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया है। अपनी अनुभूति से निर्धारित आदर्शों को पालन करते हुए, आप अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं आपके प्रश्न के लिए धन्यवाद। यह अच्छी बात है कि आप जागरूक हैं और खुद को समझने और सुधार करने के लिए तैयार हैं। यह समझना अहम है कि हमारे आस-पास की दुनिया हमारे विचारों और आदर्शों से पूरी तरह संचालित नहीं होती है। हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए और स्वयं को स्थितियों के साथ समायोजित करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ओशो कहते हैं कि आदर्श एक मानसिक झिल्ली है, जो हमें स्वतंत्र नहीं बनने देती है। आदर्शों के बारे में सोचने से हमें वास्तविकता से दूरी होती है और हम उस व्यक्ति के बारे में सोचना भूल जाते हैं जो हम हैं। हम जब अपने आदर्शों के अनुसार जीना शुरू करते हैं, तो हम अपने आप से दूर हो जाते हैं और असमर्थ हो जाते हैं अपने आदर्शों को पूरा करने के लिए। इसलिए, ओशो सिद्धांत के अनुसार, हमें अपने जीवन में आदर्शों की जगह अनुभवों की जगह देनी चाहिए। अनुभवों से हम अपने जीवन का रंग देते है मुझे लगता है कि आप एक ओशो प्रशंसक हैं। आपने उनके प्रवचनों के बारे में बात की है और उनके आदर्शों के बारे में भी उल्लेख किया है। आप उनसे कुछ निराश होते हैं क्योंकि आप उन आदर्शों को अपने जीवन में नहीं जी पाते हैं। ओशो ने अपने शिष्यों को कभी भी कोई आदर्श नहीं दिया था। वे समझाते थे कि जीवन निर्माण का काम आपका होता है और आपको अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए। वे समझाते थे कि जीवन आपकी खुद की रचना होती है, इसलिए आपको अपने जीवन के रचनात्मक दल के साथ सहयोग करना चाहिए। ओशो के शिष्यों को यह समझाया जाता था कि आदर्श जिस तरह से हम सोचते हैं उससे वे पूरी तरह से विचलित होते हैं। आदर्शों से अपने आप को मुक्त करने के लिए, हमें उन्हें समझना चाहिए और उनसे बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार हम अपने जीवन के निर्माण में सफल हो सकते हैं। लोग अपने आदर्शों को अधिक उच्च मानकर उन्हें प्राप्त करने का प्रयास करते हैं और उन्हें अपने असाधारण जीवन में जीने का अभ्यास करते हैं। लेकिन यह एक भ्रम है कि जब हम अपने आदर्शों को जीने का प्रयास करते हैं, तो हम उन्हें असाधारण बनाने के लिए एक आदर्श बनाते हैं और उनके साथ रहने के लिए हमारे लिए अपर्याप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि बहुत से लोग ओशो के प्रवचनों से प्रभावित होते हैं लेकिन उन्हें अपने आदर्शों को पाने में कठिनाई होती है। ओशो कहते हैं कि हमें अपने आदर्शों को छोड़ना चाहिए और सभी आदर्शों के साथ निपटने की क्षमता को विकसित करना चाहिए। इससे हम अपने जीवन को सरल बना सकते हैं और उसे स्वतंत्रता से जी सकते हैं। ओशो इस विषय में अपनी कई पुस्तकों और प्रवचनों में विस्तार से व्याख्या करते हैं। ओशो के शिष्यों के अनुसार, आदर्श एक साधन है जो हमें स्वयं के विकास के लिए उपयोगी हो सकता है। आदर्श हमें इस दिशा में दिशा-निर्देश देते हैं कि हम जीवन में क्या सच्ची खुशी और संतुष्टि का अनुभव कर सकते हैं। लेकिन इन आदर्शों के पीछे अपने आप को विवश करने की जगह, हमें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीने की सलाह दी जाती है। ओशो उन लोगों के विरोध में थे जो एक साधारण जीवन जीने की सलाह देते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को उन्हें उनके अंतरंग स्वभाव से जुड़े रहने की सलाह दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर व्यक्ति अलग-अलग होता है और वे अपने जीवन में खुशी और संतुष्टि के लिए उनके अंतरंग स्वभाव के अनुसार कार्य करें। ओशो के शिष्यों को यह समझाया गया था कि जीवन में सफलता उन्हें उनके अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीने के लिए आवश्यक होती है। यह उनके अंतरंग स्वभाव के अनुसार अपने जीवन की रचना है ओशो के अनुयायी यह समझते थे कि आदर्श या आदर्शों से जुड़े बंधन हमें बाधित करते हैं और हमें स्वतंत्र नहीं रखते। वे समझाते थे कि हमें अपने जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट करना चाहिए और उसे प्राप्त करने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करना चाहिए। ओशो का अर्थात जीवन में आदर्शों का स्थान नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें स्वतंत्र होकर अपने जीवन के निर्माण में सहायता करने वाले दोस्तों और समूहों से संबंधित होना चाहिए। इस प्रकार, ओशो ने अपने शिष्यों को एक स्वतंत्र जीवन जीने के लिए प्रेरित किया था, जहाँ वे अपने अंतरंग विकास के लिए अपने आप को स्वतंत्र रख सकते हैं। उन्होंने अपने प्रवचनों में अंतरंग शांति और स्वयं जागरूकता की महत्वता को भी बताया है। इसलिए, ओशो के अनुयायी अपने जीवन को अपने अंतरंग विकास के लिए अभिवृद्धि करने के लिए प्रेरित होते हैं, जिससे उन्हें समाज और आदर्शों से मुक्ति मिलती है। ओशो के विचार जीवन के निर्माण के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया है कि हमें अपने जीवन के निर्माण में एक समृद्ध और उत्तम विचारधारा का अनुसरण करना चाहिए। इस विचारधारा में हमें अपने स्वभाव, समाज और पर्यावरण के साथ संघर्ष करते हुए सफलता की ओर बढ़ना चाहिए। ओशो के अनुसार, आदर्शों का सही उपयोग वह होता है जब वे हमें स्वतंत्र बनाते हैं, न कि हमें विवश बनाते हैं। इसलिए, हमें अपने आदर्शों के साथ खुश नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें समझने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार हम उनसे सीखते हैं और उनसे आगे बढ़ते हैं। ओशो ने भी बताया है कि हमें अपने जीवन में आत्मनिर्भर होना चाहिए। हमें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए और जीवन के सभी पहलुओं के साथ संतुष्ट रहना चाहिए। इसके लिए, हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझना और स्वीकार करना चाहिए। आपकी बात सही है कि मैं एक ओशो प्रशंसक हूँ। ओशो ने अपने शिष्यों को यह समझाया था कि आदर्श जैसे कि धर्म, राष्ट्रीयता, संगठन, या किसी अन्य विषय पर आधारित नहीं होने चाहिए। अधिकतर लोगों को यह लगता है कि एक आदर्श का होना ज़रूरी है, लेकिन ओशो ने इस विचार को खंडित कर दिया था। ओशो ने स्वतंत्रता और असीमितता की एक नई परिभाषा दी थी जो उनके शिष्यों को जीवन की असीमितता और स्वतंत्रता के साथ जीने की सीख देती थी। इसके लिए, ओशो ने उनके शिष्यों को आत्मनिर्भरता की एक समझ दी थी, जिससे वे अपने जीवन की रचना खुद तय कर सकते हैं। ओशो ने इस विश्वास को बताया था कि आपके अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीना चाहिए। आपके जीवन में कोई आदर्श नहीं होना चाहिए, बल्कि आपको खुद अपने जीवन को निर्माण करना चाहिए। ओशो ने अपने शिष्यों को उनके अंतरंग स्वभाव को जानने और समझने के लिए प्रेरित किया था ओशो के विचारों के अनुसार, जीवन में सफलता और संतुष्टि प्राप्त करने के लिए आदर्शों को छोड़कर अपने स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए। यह अर्थ है कि हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझना चाहिए और उसे स्वीकार करना चाहिए। ओशो ने समझाया कि जीवन का मकसद आनंद और जीवन में समृद्धि है, और हमें इसके लिए अपनी जिंदगी का निर्माण करना चाहिए। ओशो के अनुसार, अपने जीवन में सफल होने के लिए हमें खुशी, प्यार, समझदारी, स्वतंत्रता और समृद्धि की तलाश में रहना चाहिए। ओशो ने समझाया कि संतुष्टि सभी के लिए भिन्न-भिन्न होती है और जो आपके लिए संतुष्टि है, वह दूसरों के लिए संतुष्टि नहीं हो सकती है। ओशो का संदेश था कि हमें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीना चाहिए, और जीवन को उसकी समृद्धि और संतुष्टि के लिए निर्माण करना चाहिए। इसके लिए, हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझना चाहिए, और उसे स्वीकार करना चाहिए। आपका विचार सही है कि मैं ओशो के शिष्यों की तरह नहीं हूँ और उनके आदर्शों को अपने जीवन में पूरी तरह से नहीं जी पाता हूँ। लेकिन मैंने ओशो के विचारों को पढ़ा और समझा है और मुझे उनकी विचारधारा से कुछ शिक्षा मिली है। आपके द्वारा बताया गया ओशो के विचारों का मतलब है कि हमें अपने आदर्शों से बाहर निकलना चाहिए ताकि हम अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से रच सकें। हमें अपने जीवन को स्वतंत्र रूप से रचने के लिए अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए। हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझने और स्वीकार करने की आवश्यकता होती है। ओशो का मतलब था कि हमें जीवन के रचनात्मक दल के साथ सहयोग करना चाहिए। हमें उन लोगों के साथ रहना चाहिए जो हमारे अंतरंग स्वभाव को समझते हैं और हमें समर्थन प्रदान करते हैं। जब हम अपने स्वभाव को समझते हैं तो हम अपने जीवन में अपनी प्रियतम चीजों को शामिल कर सकते हैं ओशो के विचार और आदर्श जीवन के निर्माण में सहायता कर सकते हैं। वे समझाते थे कि जीवन एक अनुभव है और हमें उसे पूरी तरह से जीना चाहिए। इसके लिए हमें अपने आत्मसम्मान को बढ़ाने और स्वयं को समझने की आवश्यकता है। ओशो अपने शिष्यों को मार्गदर्शन करते थे ताकि वे अपने अंतरंग स्वभाव को समझ सकें और उसके अनुसार जीवन जी सकें। ओशो के विचारों में आदर्शों का विरोध था, क्योंकि आदर्श हमें हमारे असली स्वभाव से दूर ले जाते हैं और हमारे जीवन में संतोष नहीं देते हैं। इसके बजाय, हमें अपने जीवन के असली रुचि को समझने की आवश्यकता है और उसे अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके अलावा, ओशो ने स्वतंत्रता और विवेक के महत्व को भी बताया था। वे समझाते थे कि हमें अपने जीवन के फैसलों को अपने स्वयं के विवेक के आधार पर लेना चाहिए। स्वतंत्रता के माध्यम से हम अपने जीवन को अपनी मर्जी से जी सकते हैं आपने ठीक कहा है कि ओशो ने अपने शिष्यों को कोई आदर्श नहीं दिया था बल्कि उन्होंने उन्हें जीवन के निर्माण के लिए स्वतंत्रता दी थी। ओशो ने समझाया कि हर व्यक्ति का अलग-अलग स्वभाव और अभिरुचि होती है और उनके अनुसार वे अपने जीवन को रचनात्मक दल के साथ जीना चाहिए। ओशो ने समझाया कि हमारे जीवन में विभिन्न आदर्श होते हैं जैसे सुख, शांति, स्वास्थ्य और संतुष्टि आदि। लेकिन आदर्शों को पूरा करने के लिए हमें उन्हें समझने और उनके अनुसार अपने जीवन को रचनात्मक दल के साथ जीना चाहिए। हमें अपने संदेहों, भयों और अन्य नकारात्मक विचारों से मुक्त होने की आवश्यकता होती है जो हमारे आदर्शों को असफल बनाते हैं। ओशो ने बताया कि सहज स्थिति में हम उन सभी गुणों के साथ जीते हैं जो हमारे आदर्श होते हैं। हमें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए जो हमें आदर्शों को पूरा करने में मदद करता है हाँ, आप सही कह रहे हैं, मैं ओशो के विचारों का प्रशंसक हूँ। ओशो ने अपने शिष्यों को यह समझाया था कि आदर्श आपके जीवन को बाधित कर सकते हैं और आपको अपने असली स्वभाव से दूर ले जा सकते हैं। ओशो ने समझाया कि हमें अपने अंतरंग स्वभाव को जानना चाहिए और उसके अनुसार जीना चाहिए। आदर्शों के स्थान पर, ओशो ने अपने शिष्यों को जीवन के लिए नए दृष्टिकोण दिए थे। उन्होंने शिष्यों को उनके असली स्वभाव के अनुसार जीने के लिए प्रेरित किया। ओशो ने अपने शिष्यों को समझाया कि जीवन निर्माण उनका काम होता है और वे अपने जीवन के रचनात्मक दल के साथ सहयोग करना चाहिए। इस प्रकार, ओशो ने शिष्यों को स्वतंत्रता और अनुभव के माध्यम से अपने जीवन को निर्माण करने के लिए प्रोत्साहित किया। ओशो ने अपने शिष्यों को यह बताया कि आदर्शों से मुक्त होने के लिए हमें अपने जीवन को स्वतंत्रता से निर्माण करना ओशो एक महान संत और दार्शनिक थे, जो भारत के धार्मिक और दार्शनिक विरोधों के खिलाफ लड़ने और विश्व में शांति और समझौते को बढ़ावा देने के लिए अपने जीवन के बड़े हिस्से को समर्पित कर दिया। उनके उपदेशों के माध्यम से, वे लोगों को अपने अंतरंग ज्ञान के साथ जीवन के सभी पहलुओं को समझने के लिए प्रेरित करते थे। ओशो का संदेश था कि आदर्शों से मुक्ति पाने के लिए हमें उन्हें समझना चाहिए और उनसे बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए। उनके अनुयायी से यह अपेक्षा नहीं की जाती थी कि वे उनके आदर्शों के अनुसार जीवन जिएं, बल्कि उन्हें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीने की सलाह दी जाती थी। ओशो के अनुयायी समझते थे कि जीवन निर्माण का काम व्यक्ति का होता है, और उन्हें अपने जीवन के रचनात्मक दल के साथ सहयोग करना चाहिए। ओशो ने जीवन को अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीने की महत्वपूर्णता बताई है। वे इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझने के लिए मन को शांत और ध्यानित रखना चाहिए। ओशो का यह उपदेश भी दिखाता है कि हम अपने आदर्शों से मुक्त होने के लिए उन्हें समझने की जरूरत है। हमें यह समझना चाहिए कि आदर्श हमारे मन में विचारों के रूप में होते हैं और हमें उनसे अलग होने के लिए उन्हें अपने मन से निकालने की जरूरत होती है। इस प्रकार, हम अपने अंतरंग स्वभाव को समझते हुए अपने जीवन को रचनात्मक ढंग से जीने में सक्षम हो सकते हैं। ओशो के अनुयायी उनके उपदेशों के माध्यम से अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करते हैं। ओशो का मानना था कि आदर्श या निराधार विचारों से हमारी मनोदशा प्रभावित होती है और हमें अस्थिर बना देती है। इसलिए, ओशो ने अपने शिष्यों को इस बात का महत्व बताया कि हमें अपने जीवन में आदर्शों के बजाय अपने स्वयं के मूल्यों और अंतरंग स्वभाव के आधार पर जीना चाहिए। ओशो का दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत था कि हमारा जीवन हमारी खुद की रचना होता है और हमें इसे स्वयं निर्माण करना चाहिए। ओशो ने अपने शिष्यों को उनके निजी अनुभवों से सीखने को प्रेरित किया और उन्हें स्वयं को जानने और स्वीकार करने का मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने शिष्यों को अपनी स्वतंत्रता का अधिकार दिया और उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया। ओशो एक विचारक, गुरु और धार्मिक नेता थे जिन्होंने अपने उपदेशों के माध्यम से संसार के जीवन को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने अपने शिष्यों को यह समझाया कि आदर्श एक आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीवन जीना चाहिए। उन्होंने समझाया कि आदर्शों के बल पर हम खुद को बाधित करते हैं और इससे हमें समाज और जीवन से अलग हो जाना पड़ता है। वे समझाते थे कि जीवन को समझने के लिए हमें अपने अंतरंग स्वभाव को समझना और उसके अनुसार जीना चाहिए। उनके अनुयायी यह समझते थे कि जीवन एक अनुभव है जो हमें स्वयं से समझना चाहिए, और उनके उपदेशों का उद्देश्य यह नहीं था कि लोगों को एक निश्चित दिशा दी जाए। इसके बजाय, उनका उद्देश्य था लोगों को उनके अंतरंग स्वभाव को समझने और उसे व्यक्त करने में सहायता करना। ओशो के उपदेशों के माध्यम से, उनके शिष्यों को यह समझाया गया कि आदर्श नहीं होते हैं ओशो के शिष्यों के लिए आदर्श नहीं होते थे, बल्कि वे समझाते थे कि जीवन एक अनुभव है जो हमें अपने अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहिए। यह मतलब है कि आदर्शों के ज़रिए हम स्वयं को प्रतिबंधित करते हैं और उनसे अलग होने का प्रयास करते हुए हम स्वतंत्र नहीं हो पाते हैं। इसके बजाय, ओशो शिष्यों को यह शिक्षा देते थे कि जीवन में उन्हें अपने स्वयं के जीवन के रचनात्मक दल के साथ सहयोग करना चाहिए। इस तरह से, शिष्य अपने जीवन को अपने स्वयं के अनुसार रचना कर सकते हैं और समृद्ध जीवन जी सकते हैं। इसलिए, ओशो के शिष्यों को यह समझाया जाता था कि जीवन का निर्माण सिर्फ उन्हीं के हाथों में है जो अपने स्वयं के अंतरंग स्वभाव के अनुसार जीना चाहते हैं। आदर्शों के बजाय, हमें अपने स्वयं के अनुभव से शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए और अपने जीवन को अपने स्वयं के अनुसार रचना करना चाहिए।

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